स्थायी
वैशाख की चतुर्दशी आए
गुरु नरसिंह को भजते जाएँ
नर नारी सब मंगल गाएँ
जय नरसिंह हरे, जय नरसिंह हरे।
ऋषि मुनि भी शीश नवाएँ
श्रद्धा सुमन के दीप जलाएँ
असुरों का संहार करें जो
जय नरसिंह हरे, जय नरसिंह हरे।
अंतरा
भक्त प्रहलाद दोनों कर जोड़े, श्री हरि नाम का जाप न छोड़े।
हिरणाकश्यप दुष्ट अधर्मी, मार रहा था क्रोध में कोड़े|
रौद्र रूप प्रभु ने बनाया, उदर
फाड़ सबको बचाया|
प्रहलाद को फिर गले लगाया।
जय नरसिंह हरे, जय नरसिंह हरे।
श्री हरि का अवतार तुम्हारा, भक्तजनों को लागे प्यारा।
कष्ट पीड़ा से मुक्त कराओ, जग को फिर से दरस दिखाओ।
भक्त सभी हैं वंदन करते, और ललाट पे चंदन करते।
तुम्हारे नाम का ध्यान धरेँ सब,
जय नरसिंह हरे, जय नरसिंह हरे

